ऋतुराज वसंत के आगमन पर
धानी सरसों पीली चूनर ओढ़ रहीं।
गीली माटी की सोंधी खुशबू
सरसों की भीनी भीनी खुशबू संग
घर आँगन को महका रहीं।
मंद हवा संग सुनहरी किरणें
ओस से गीले खेतों की चमक बड़ा रही।
मनमोहक दृश्य कृषक के हृदयतल में
उम्मीदों का पौधा लगा रहे,
मन की अंधेरी गलियों में
उम्मीद का दीपक जला रहे।
प्रकृति कृषक के लबों पर
अदभुत मुसकान बिखेर रही।
सूरज की सुनहरी किरणें कृषक की
सूनी सूनी अंखियों में खुशियों की चमक ला रही।
कोयल की कूँ कूँ कानों में मिश्री घोल रही।
गोरी के हृदयतल में प्रेम का पौधा लगा रही ।
प्रीत नगर की गलियों में प्रेम की सहनाई बजा रही,
झील सी गहरी अंखियों में सुनहरे सपने सजा़ रही।
नये नये पत्ते वृक्षों को रंग बिरंगे नये वस्त्र पहना रहें।
अम्बवा फूट रहें ,टेसू फूल रहें।
वसंत ऋतु को प्रकृति ऋतुराज बना रही,
प्रकृति की खूबसूरती भाषा की धरती पर,
कविता की धारा बहा रही रही!
अरे वाह! बासन्ती कविता और इस पर इतनी देर से पहुँच पाई,खेद है मुझे।सच है प्रकृति ही तो कविता की जननी है।बहुत अच्छा शब्द चित्र रचा है प्रिय मनीषा।
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